ये जो तुमसे प्यार करने की गुस्ताखी हो गई ..२
ज़रा इस गुस्ताखी की वज़ह भी सुन लेना
एक बार आईने में खुद को हंसते हुए देखो तो सही
तुमको भी तुमसे प्यार न हो जाए...तो कहना
एक तुम हो जो खुद से ही नाराज़ है..२
एक मैं हूॅं जिसे तुम पर नाज है
एक बार अपनी खूबियां पहचानो तो सही
तुमको भी तुम पर नाज न हो जाए...तो कहना
मेरी आंखों की भाषा तुम समझ रहे हो..२
शायद मन की अभिलाषा भी समझ रहे हो
एक बार मेरी दीवानगी भी समझो तो सही
तुमको भी मुझसे प्यार न हो जाए...तो कहना
एक बार आईने में खुद को हंसते हुए देखो तो सही
तुमको भी तुमसे प्यार न हो जाए...तो कहना
* सूरज मुजफ्फरनगरी
( शायरी -दिल-से )
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