"गुरु पूर्णिमा" की पूर्व संध्या पर गुरुजनों के सम्मान में एक काव्य रचना...
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दुनिया में कुछ ऐसे लोग,बोले अहंकार के बोल,
जैसे ज्ञानी उनके जैसा, दूजा कोई नहीं है।
और गुरु के प्रति जिस शिष्य के मन में आदर नहीं,
उसको तो जीवन में लक्ष्य, मिला कोई नहीं है।।
शिष्य गुरु बिन अधूरा, बिन शिष्य गुरु न पूरा,
गुरु-शिष्य जैसा संबंध, और कोई नहीं है।
ऊंच-नीच, जात-पात, भेदभाव से वो दूर,
गुरु की नजरों में, छोटा-बड़ा कोई नहीं है।।
विद्या का वो दान देता,सबको एक समान देता,
राजा हो या रंक, खाली जाता कोई नहीं है।
मर्यादा पुरुषोत्तम होता,वो ही शिष्य गुरु होता,
बिना शिष्य बने, गुरु होता कोई नहीं है ।।
गुुुरुजनों का मान बढ़ाएं,हम चरणों में शीश झुकाएं,
गुरु की सेवा से बढ़कर, पूजा कोई नहीं है।
और क्यूं ना मन में 'सूरज' चाहे,अच्छा शिष्य ही बन जाए,
अच्छा गुरु ना भी बने, गिला कोई नहीं है।।
ये दुनिया है मझधार, सबके हितैषी हजार,
लेकिन कर्णधार गुरु जैसा कोई नहीं है।
माना एक से बढ़कर एक, दुनिया में हैं फनकार,
लेकिन शिल्पकार गुरु जैसा कोई नहीं है।।२
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सभी गुरुजनों को सादर प्रणाम 🙏
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* Suraj Muzaffarnagary
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दुनिया में कुछ ऐसे लोग,बोले अहंकार के बोल,
जैसे ज्ञानी उनके जैसा, दूजा कोई नहीं है।
और गुरु के प्रति जिस शिष्य के मन में आदर नहीं,
उसको तो जीवन में लक्ष्य, मिला कोई नहीं है।।
शिष्य गुरु बिन अधूरा, बिन शिष्य गुरु न पूरा,
गुरु-शिष्य जैसा संबंध, और कोई नहीं है।
ऊंच-नीच, जात-पात, भेदभाव से वो दूर,
गुरु की नजरों में, छोटा-बड़ा कोई नहीं है।।
विद्या का वो दान देता,सबको एक समान देता,
राजा हो या रंक, खाली जाता कोई नहीं है।
मर्यादा पुरुषोत्तम होता,वो ही शिष्य गुरु होता,
बिना शिष्य बने, गुरु होता कोई नहीं है ।।
गुुुरुजनों का मान बढ़ाएं,हम चरणों में शीश झुकाएं,
गुरु की सेवा से बढ़कर, पूजा कोई नहीं है।
और क्यूं ना मन में 'सूरज' चाहे,अच्छा शिष्य ही बन जाए,
अच्छा गुरु ना भी बने, गिला कोई नहीं है।।
ये दुनिया है मझधार, सबके हितैषी हजार,
लेकिन कर्णधार गुरु जैसा कोई नहीं है।
माना एक से बढ़कर एक, दुनिया में हैं फनकार,
लेकिन शिल्पकार गुरु जैसा कोई नहीं है।।२
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सभी गुरुजनों को सादर प्रणाम 🙏
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* Suraj Muzaffarnagary