सरकार ने किसान आंदोलन से जुड़े उन तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया है जो अभी लागू ही नहीं हुए थे। इस बात को लेकर असली किसानों में कितना हर्ष है इसका तो पता नहीं लेकिन कुछ नेताओं की खुशी का ठिकाना नहीं। वे ऐसे खुश हो रहे हैं जैसे किसानों से जुड़ी सभी समस्याओं का निदान हो गया हो। फसलों की खरीद-फरोख्त को लेकर पुराने ढर्रे पर चली आ रही 'बिचौलिया व्यवस्था' को खत्म करने की नेताओं की बड़ी-बड़ी बातें एकदम से गायब हो गई। इसी ज्वलंत मुद्दे पर एक प्रश्नात्मक और व्यंग्यात्मक काव्य रचना प्रस्तुत है जिसका शीर्षक है...
"कृषि कानून वापस हो गए तो..."
......…........................
कृषि कानून वापस हो गए तो...
क्या भूखों मरेंगे "बिचौलिए" ?
क्या जनता भी चिंतामुक्त हुई ?
क्या किसानों के दुःख खत्म हो लिए ?
क्या किसान न कर्जदार होंगे ?
क्या किसान न आत्महत्या करेंगे ?
वंशवादियों के राज में क्या हाल था ?
इस बात का फैसला तो तथ्य करेंगे !
क्या किसानों की हो जाएंगी मंडियां ?
क्या बिचौलिए छोड़ देंगे पगडंडियां ?
क्या आंदोलनजीवी घर बैठ जाएंगे ?
क्या जला दी जाएंगी देशविरोधी झंडियां ?
क्या ढर्रे वाला ताम-झाम छिनेगा ?
क्या किसानों को मंडियों में काम मिलेगा ?
क्या वंशवादियों ने कोई सुख दे रखा था ?
क्या किसानों को सुख वो तमाम मिलेगा ?
क्या सड़कों पर से जाम खुलेगा ?
क्या यात्रियों को भी आराम मिलेगा ?
क्या राजनीति में फेल पप्पुओं को ,
सफलता का कोई मुकाम मिलेगा ?
क्या कोई हल निकलेगा मसलों का ?
क्या सही दाम मिलेगा फसलों का ?
क्या हर ओर खुशहाली होगी ?
क्या °'कल' सुधरेगा °नस्लों का ?
अगर वाकई ये सब सच होने वाला है।
फिर तो नेताओं का खुश होना बनता है।
राजनीतिक नूरा-कुश्ती है तो मत भूलना ,
नेताओं की भाग्य-विधाता जनता है।
कृषि कानून वापस हो गए तो...
क्या भूखों मरेंगे "बिचौलिए" ?
नेताओं ने तो चुप्पी साध ली है ,
°मिया ! आप ही कुछ बोलिए ?
.............................................
(°कल-भविष्य ,°नस्ल-भावी पीढ़ी
°मिया-मिया खलीफा)
* सूरज 'मुजफ्फरनगरी'
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें